Thursday, February 24, 2011

क्या लिखूं?

क्या लिखूं?
सच लिखूं  या झूठ का साज सुनाऊं!!

अपने मन का भाव सुनाऊं या चुप  रहूँ,
दुनिया को देखूं और दिखाऊं!!

क्या समझूं ?

उसको बाचूँ जो दिखता है,या उसको समझूँ जो समझाया जाता है1
दुनिया को देखूं, और अलग-अलग बातें सीखूं !!

क्या बताऊ?

अपनी झूटी खुशियाँ दिखलाऊं,
और दुःख का भाव छुपाऊं!!

और क्यूँ न  इन सब से अच्छा करूँ?
क्यूँ न चुप रहूँ !!

इस दोहरेपन को दुनिया की रीत समझूँ ,
ख़ामोशी की आवाज सुनु और सुनाऊं!!

सबकुछ छुपाऊं,
और हंस कर अपना नाम सार्थक करूँ !!

 -हर्षिता   

7 comments:

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  2. सुंदर कविता...सुंदर विचार !

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  3. Er. सत्यम शिवम जी,
    मेरी रचना को पसन्द करने के लिए आभारी हूं।
    मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद!

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  4. इस दोहरेपन को दुनिया की रीत समझूँ ,
    ख़ामोशी की आवाज सुनु और सुनाऊं!!

    मनोभावों को खूबसूरती से पिरोया है। बधाई।

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  5. मन की उलझन को बखूबी बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति दी है ! बहुत सुन्दर एवं भावपूर्ण रचना ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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